Vinoba Bhave: Desirability and Necessity of Hindu Muslim Unity.

At the outset I must confess that I am not acquainted with Vinoba Bhave‘s thoughts, his writings, or his life’s work, except in a vague, non-flattering outline. The two words I associate with him since my school days are भूदान (donating excess land to landless) and सर्वोदय (universal progress). The picture I have of him from what I learnt again in school-days is of an uncompromising idealist, who was a little removed from ground realities and real politics. When I was in college, and Indira Gandhi imposed emergency by flouting all Constitutional diktats and norms, Vinoba had initially supported her by terming Emergency अनुशासन पर्व (Epoch of discipline). When state of emergency ended in early 1977, he was again asked for his response as to its achievements, and he reputedly said, ओम फस्स (good for nothing). This shouldn’t be read as my introduction to Vinoba Bhave, but more aptly as the declaration of my ignorance of his life and work.
Recently, a senior Sarvodaya activist and thinker, Daniel Mazgaonkar, was given a manuscript in मराठी (Marathi) by his friend, Parag Cholkar. The manuscript, Cholkar said, was written down by Sane Guruji, when Vinoba participated in a question and answer session on the issue of desirability and necessity of Hindu-Muslim unity. The persons who put the questions to Vinoba were obviously not Muslims, and from the tone of answers given were obviously not well disposed towards the Muslim community. Mazgaonkar took the trouble to convert the manuscript into digital format (Marathi)  and shared it among his large friend circle. I too received a copy. I read it with interest, and though I have difficulty with some of Vinoba’s formulations, I thought there is much to learn from it. Vinoba had declared “that the days of Religion are over. World will be a family and all narrow boundaries of nationhood, caste, creed will dissolve and people will live in peace with each other. Vinoba’s vision is that the days of Politics will be over. With love for one another,  people will share all other God’s resources like air“. That has not happened even though the first decade of twentieth century is over. The blame for it doesn’t lie in Vinoba’s vision but the shortsightedness of our vision and the destructive actions, which spring from it. Thinkers and writers the world over, who are exercised over the future of humans and have known nature as it was and is, are unanimous that unless we all swim together as one, we are likely to only drown separately. That apart, the virus of communalism still threatens to drive us asunder. Vinoba’s words are therefore worth careful consideration. I share Mazgaonkar’s labour of love below after his short introduction to the digitisation he undertook.
र्म – जाति – पंथ – भाषा – पक्ष – प्रांत
विषमता का अंत याने सर्वोदय.
प्रिय साथी,

मेरे मित्र पराग चोळकर की ओर से मुझे यह दस्तावेज प्राप्त हुवा था. जिसके लिए मैं उनका ऋणी हूँ. उन्होने ही मुझे यह भी कहा था कि इस प्रश्र्नोत्तरी के दरम्यान क्यूँ कि साने गुरूजी उपस्थित थे, उन्होंने ही इसको, विनोबाजी के जबाब देते समय, लिख लिया.

मैंने जो टाईप किया है, उसका प्रूफ-रीडिंग नहीं किया, नहीं कर सका. और आप की भी दया आती थी (थोडा विनोद) कि आप एकसाथ कितना पढ सकेंगे, आजकल के इस ग्लोबलायझेशन की आपाधापी में. इसलिए इस को दो-तीन किश्तों में मैं भेज पाऊंगा. ताकि आप भी इसे आराम से पचा पाओगे. आशा है आप के प्रतिभाव अवश्य मुझे शीघ्र प्राप्त होंगे.

डॅनियल माजगांवकर के जय-जगत्.

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10 Responses to “Vinoba Bhave: Desirability and Necessity of Hindu Muslim Unity.”

  1. Danile Mazgaonkar Says:

    प्रिय सदानंदभाई,तुमच्या ब्लोग साठी जी प्रस्तावना तुम्ही लिहीली आहे, त्यात तुम्ही आपात्काल ला अनुशासन पर्व ला विनोबाजीनी समर्थन दिले होते हे जे म्हटले आहे, (मूळ शब्द वेगळे असतीलहि) ते चुकीचे आहे, आणि खरे म्हणजे, तो वसंत साठे या इंदिरा गांधी केबिनेट मधील मंत्र्यांनी जाणुन बुजुन पसरविलेला गैरसमज आहे. फक्त मुद्दा एवढाच की श्रीमन्नारायणजी सारख्या आणि अन्यांनी सुद्धा खूप आग्रह केला तरी विनोबाजींनी त्या उलट निवेदन दिलें नाहीं. व शेवटी जेव्हां मौन सोडल्यावर जे भाषण केले, त्यात अगदी स्पष्ट उल्लेख आहे की त्यांचा अनुशासन पर्व चा काय अर्थ होता. तुम्हासाठी एक उतारा श्रीमती कुसुम देशपांड यांचा पाठवतो जो नुकत्याच हाती आलेल्या मैत्री मासिकातून उद्धृत केलेला आहे. त्यावरून हि स्पष्ट होईल. परंतु हा गैरसमज मुद्दाम निहित स्वार्थी जनांनी आणि इंदिरा-समर्थकांनी पसरविलेला होता. उताराः (मैत्री मासिक, जुलै २०१३, पृष्ट २०७ः अपनी बात, कुसुम देशपांडे)' अनुशासन – पर्व ' शब्द को लेकर बहुत विवाद चला. पर उससे उनके सत्य-गर्शन पर कोई असर नहीं हुआ. याद आते हैं उनके ही कुछ वचन. " जब मैं विचार समझाता हूं तो सामने ब्रह्मदेव भी बैठे हों, मुझे उसकी परवाह नहीं होती." या " बाबा (विनोबा) के बारेमें जितनी गलतफहमी होती है उतनी ज्यादा खुशी उसे होती है."'अनुशासन पर्व' को लेकर जो टीका का उछाल आया था, वह उनके लिए हलाहल कभी बना ही नहीं ; उनकी उस समय की सहजावस्था में वह सहज ही विलीन हो गया. देखने की बात तो यह है कि जब उस शब्द को इस तरह उठाया गया तब विनोबाजी उस शब्द के सामने प्रश्र्नचिन्ह ही लगाते गये, जैसा कि पहली बार वह शब्द जब व्यक्त हुआ तब लगाया था. ( डॅनियल की नोट – वसंत साठे ने लेखित पर्चा दिया उसपर विनोबाजी ने ' अनु. पर्व ' के आगे प्रश्र्नचिन्ह लगाया था, मतलब यह उनका था कि वे साठे को पूछ रहें हों मानो कि क्या इमरजन्सी ' अनुशासन परव ' है ?) उन दिनों एक बार नशाबंदीवाले नशाबंदी-सप्ताह के लिए संदेश लेने उनके पास आये थे, तब उन्होंने लिखकर दिया था, मौन था इसलिए — " अनुशासन पर्व में नशाबंदी नहीं ? अनुशासन के लिए वह अत्यंत आवश्यक है." प्रवास के दरम्यान एक साथी के सामान की चोरी हुई. यह जब उन्हें कहा गया, तब उन्होंने लिखा– "अनुशासन पर्व में चोरी ? अनुशासन पर्व में चोरी तो नहीं होनी चाहिए." अन्य किसी के प्रश्र्न के उत्तर में लिखा था "इमरजन्सी अमरजन्सी नहीं है" ; मतलब, इमरजन्सी थोडे समय के लिए है, हमेशा के लिए नहीं . जब उनके शब्द को गलत तरह से उठाया गया, तो उसी का उपयोग उन्होंने स्वयं इस तरह किया, जो उनकी मूल भूमिका को ही स्पष्ट करता है. परंतु इस पर इतनी सूक्ष्मता से सोचकर बात समझ लेने की मनःस्थिति उस समय किसी की नहीं थी. मौन-समाप्ति के बाद किये भाषण में उन्होंने ' अनुशासन पर्व ' के आशय को स्पष्टतापूर्वक विशद किया ही हैप्रस्तुत काल में विनोबाजी का संपूर्ण चिंतन और प्रयास अप्रतिकार की शक्ति अर्थात् शुद्ध अहिंसा विकसित करने का था. यह रास्ता ही ऐसा है कि गंतव्य का दर्शन एकदम नहीं हो सकता. नतीजा यह रहा कि विनोबाजी की भूमिका उस समय समझ में नहीं आ सकी. लेकिन अब कइयों के मुख से उद्गार सुनने को मिलते हैं कि, " हां, विनोबाजी का कहना सही था, अब ध्यान में आ रहा है. "इस सारी खींचातानी में वे चट्टान की तरह अडिग, अडोल हैं, इमरजन्सी को उन्होंने 'अनुशासन पर्व ' तो नहीं कहा था. बल्कि उसके सामने प्रश्र्नचिन्ह लगाकर मानो पूछा था कि क्या आज का पर्व अनुशासन पर्व है ? मौन न होता और बोलते तो ऐसा ही पूछते न -परंतु उस शब्द का अत्यंत विपर्यास किया गया – यहां तक कि उनको ' सरकारी संत ' उपाधि भी बख्शी गयी !(if you are able to find that issue of Maitri magazine, please do read the full article.Daniel

  2. Sadanand Patwardhan Says:

    प्रिय डेनिइलजी,आपने भेजा हुआ स्पष्टीकरण ब्लोगपर डाल दिया है. जैसे आपने और कुसुमजीने कहाँ है वही सत्य घटना होगी इसमें मुझे तो कोई संदेह नही है. लेकिन आपत्ति इस बातकी है की विनोबाजी जैसे संन्यासी स्थितप्रज्ञ कई बार उनकी संक्षिप्त टिपण्णीयोंसे आम जनताको बड़े संभ्रममें डाल देते है. हालांकि साठे जैसे राजकीय नेताओंको टिपण्णी देते समय तो बहुत सावधानी बरतनी चाहिए थी, जब ये लोक पूरी कही गयी बातका भी न केवल बतंगड़ पर पूरा मतलब बिघाड देनेमें माहिर है. फिर उनके अनुयायीयोंको बात सुलझानेकि चेष्टामें जुड जाना अनिवार्य हो बैठता है. सप्रेम नमस्कार,सदानंद

  3. Sadanand Patwardhan Says:

    The following comment of Professor Pushpendra Dube was sent to me by Daniel Mazgaonkar:जितना समय बीतेगा, गाँधी-विनोबा के दिखाई देने वाले दोषों (हमारी दृष्टि में) का परिहार होता जायेगा. अभी सब कुछ धुन्दला-सा है. उनकी लिखी और कही बातों में अनेक को विरोधाभास नजर आता है. दोनों का ही यदि (राजनितिक व्यक्तित्व) रहा हो तो वह विलीन हो जाने वाला है. उसके बाद जो मूल्यांकन होगा, वह अखिल विश्व की परिस्थिति को ध्यान में रखकर किया जायेगा. अनुशासन पर्व के समय भी यही प्रश्न थे : महंगाई, बेकारी, भ्रष्टाचार और गरीबी। आज भी यही प्रश्न है. लेकिन हल किसी के पास नहीं है सिवा गाँधी-विनोबा के आधुनिक और वैज्ञानिक विचारों के.

  4. Sadanand Patwardhan Says:

    प्रिय डेनीइल जी,यह कहना की गाँधी-विनोबा के विचोरोंतकही व्यवस्थाका संतोषजनक हल निकलना सिमित है, वस्तुनिष्ठ और उचित नही होगा. अनेक लोगोने इसपर चिंतन किया है, अलग अलग सुझाव दिए है. मेरे विचारमे हल तो अनेक है, लेकिन यह भांडवलशाही, विकासवादी जगन्नाथरथ जो मजबूत गतिसे निकल पड़ा है उसका रुक बदलनेकी या उसे रोकनेकी क्षमता किसीमे भी नही है. बहुतांशी लोगोंको इसकी गति तेज करना, मामूली बदलावोंके साथ, यही आर्थिक ओर सामाजिक मोक्षकी तरफ ले जानेवाला अकेला रास्ता दिखाई देता है. इस हालतमे मुझे लगता है की “वृद्धि ओर विकासके" नशेमे चलनेवाला रथ केवल पर्यावरण बदलावकी चटानसे टकराकरही टूटेगा. तब तक समाज ओर सृष्टिकी हालत क्या हुई होगी इसकी कल्पना करनाही कष्टप्रद है.

  5. Daniel Mazgaonkar Says:

    आप की बात सही है, सदानंद जी. मुद्दा इतना ही है कि आप जो कह रहे हैं उसमें से यदि बचना हो तो किसी नेता या संत के या क्रातिकारी संत के नाम को छोड दें तो भी,गांब बचने चाहिए, गांंवकी भूमि गांव के ही हस्तक रहनी चाहिए, गांव एक परिवार की तरह रहे और अपनी समस्याएं स्वयं ही अपने ही बल पर हल करें, सामूहिक निर्णय हो, सर्वसम्मति या सर्वानुमति से गांव का कारोबार गांव ही चलायें इतना भी यदि मान्य होता हो, तो हमें इसमें जरा भी आपत्ति नहीं कि गांधी विनोबा या जयप्रकाश का नाम इन सब कामों को जोडना अनिवार्य ही है. कुछ लोग जरूर हमारे सर्वोदय आंदोलन में ऐसे हैं, जिन्हें विनोबा का नाम एक जाप-यज्ञ के रूप में लिये बगैर चैन नहीं पडता या फिर जरा विनोद से कहें तो खाना भी हजम नहीं होता.डॅनियल के जयजगत

  6. Sadanand Patwardhan Says:

    डॅनियल जी, आपने गांव को केंद्रबिंदू रखके जो विचार प्रस्तुत किये है वो बिलकुल दुरुस्त है. यही खयाल anarchist परमंपराकि विचारधारामे प्रतीत होते है. गांधिका नाम इससे जुदानसे सही विचार दूर फेके जायेंगे और हस्तीके अन्य केह्नोंकेलेके बवाल खडे होंगे. दुबेजीने इसका जिक्र किया था: “उनकी लिखी और कही बातों में अनेक को विरोधाभास नजर आता है”.नमस्कार,

  7. Prof. Pushpendra Dubey Says:

    आज की समस्या यदि गरीबी, बेकारी, महंगाई और भ्रष्टाचार है तो इसका हल किसके पास है, ज़रा बताने का कष्ट करें। इसे हल करने वाले को दुनिया का श्रेष्ठ पुरस्कार नोबल पुरस्कार मिल जायेगा. इस समस्या को हल करने के लिए कुछ प्रश्न अपने आप से करने होंगे, जिनके उत्तर पर इनका हल टिका है : 1 क्या राजनीति इन प्रश्नों को हल कर सकती है ?2 क्या समाजनीति इन प्रश्नों को हल कर सकती है ?3 क्या अर्थनीति इन प्रश्नों को हल कर सकती है ? 4 क्या इतिहास की जानकारी से इन प्रश्नों को हल किया जा सकता है ? 5 क्या धर्मं इन प्रश्नों को हल कर सकता है ?6 क्या इन प्रश्नों का हल सांस्कृतिक रूप से किया जा सकता है ? 7 क्या दार्शनिक दृष्टि से इन प्रश्नों को हल किया जा सकता है ? यदि इनमे से किसी आधार से प्रश्नों को हल किया जा सकता है तो उसका तरीका क्या होगा ? उसमे कितना समय लगेगा ?वैज्ञानिक जीवन की मूलभूत जरूरते क्या है ?अध्यात्म का सर्वमान्य धरातल क्या होगा ?इन प्रश्नों पर जिन विचारकों ने बहुत गहराई से चिंतन किया है. उससे सम्बंधित प्रयोग भी किये है. उनके चिंतन से प्रेरित होकर ही विचारवानों की जमात में शामिल हुए है. उनके नाम-स्मरण से किसी को क्या परेशानी होना चाहिये. बड़े होने के बाद हम अपने पैरो पर खड़े हो गए है तो अब अपने जन्मदाता को याद करने से क्या लाभ है ?

  8. Sadanand Patwardhan Says:

    कोई किसी विचारवानों के नाम-स्मरण करेगा तो भला लगता नही किसीको कोई आपत्ति या परेशानी होगी. लेकिन किसी ठोस कार्यक्रममें प्रगट रूपसे नाम जुडाया गया तो अच्छे विचारोंपे आधारित कर्यमेभी बाधा आ सकती है. जो इन्सान एककेलिये चिंतनिय हो वो कई बार दूसरेको निंदनिय होता है. व्यक्तिपर आधारित कार्यमे कई बार इससे सामाजिक गुट बाहर हो जाते है. व्यक्तिनिष्ठा कई बार सामाजिक कार्यको बल प्रदान करती है, तो कई बार पंगु बना देती है. धन्यवाद,

  9. Professor Pushpendra Dubey Says:

    व्यक्ति निष्ठा सगुन साकार है और विचार निष्ठा निर्गुण निराकार है. यदि किसी के उंगली से हमें चाँद दिख रहा है तो उसमे क्या बुराई है. धीरे-धीरे उंगली हट जायेगी और चाँद हमें सीधा दिखाई देने लगेगा. जिस दिन से संस्थाओं का विसर्जन होना बंद हो गया है, उस दिन से व्यक्ति निष्ठा भी गयी और विचार निष्ठा भी. गाँधी ने विचार रस्किन और अन्य विद्वानों से लिया, विनोबा ने कहा ही है कि चट्टान जैसे ह्रदय से मीठा पानी निकालने का काम गाँधी ने किया। जिन्होंने समाज सेवा के क्षेत्र में आगे बढ़ने में मदद की है, उनका नाम नहीं लिया जा रहा है, तो उसे क्या कहेंगे ? हम अपनी पेट-पूजा तो उनके नाम से कर सकते है लेकिन विचार में हम उनसे कोसो दूरी बनाए रखते है. विचार अमूर्त है, उसे मूर्त होने के लिए कोइ न कोइ आलंबन चहिये. श्रद्धावान लभते ज्ञानंसंशयात्मा विनश्यति।

  10. Sadanand Patwardhan Says:

    मैने हमेशा देखा है कि निर्गुण निराकार समझना मुश्कील है कहके जब जब कोई प्रतिक या मूर्ती सामने कि गयी यह समझके की अहिस्ता अहिस्ता छड़ीका सहारा लेना कम होगा और विचारकी पकड़ मजबूत होती जायेगी, तब तब उल्टा ही हुआ है. मूर्तिपूजा मजबूत होती गयी और अहिस्ता अहिस्ता विचारोंकी यादे भी खतम हो गयी. रह गयी सिर्फ मूर्ति और खड़े हो गए उसे लेकर विवाद. थोडा स्पष्ट उदाहरण दिए, तो गाँधी का नाम लेते ही कई दलित समाजके कार्यकर्ता नाराज हो जायेंगे. इसपर कोई ध्यान नहीं देगा की पर्यावरण के साथ मिलजुल रहनेकेलिए जो करना आवश्यक है उसपर आज के दिन आंबेडकरभी शायद कोई आपत्ति नही उठाते जो उन्होंने पहले उठायी थी. क्योंकि उन्हें डर था की दलित समाज को जो संरक्षण आधुनिक गणतंत्रमें मिलनेकी ज्यादा सम्भावना है, वोह हर एक गाँव स्वंतंत्र इकाईकी मोहोलमे पूरा कुचल दिया जायेगा. आज के दिन भी दलितोंपर अत्याचारका सिलसिला ग्रामीण क्षेत्रमे विशेषकर जारी है.

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